Wednesday, May 27, 2009

कपड़े प्रेस करने का धड़ा...

राम बनाये जोड़ी एक अन्धा एक कोड़ी।

ये बोल सुने-सुने से लगते हैं। शायद ही कोई इन पंक्ती को पहचान ने से इन्कार कर सकता।

राम जाने कौन से जन्म मे मैनें पून्य किये थे जो ऐसी औरत मिली। जो मेरे ख़्याल आने से पहले ही मेरे आगे खड़ी हो जाती है। जैसे कोई दुआ कबूल हो गई हो। दोनों में एक-दूसरे के लिये बड़ा प्यार था। उम्र के काफी साल साथ-साथ बिताने के बाद भी उतनी ही महब्बूत दोनों में थी जितनी शादी के खुशनुमा और बेहद जवाँ दिनों में होती थी।

लोहे की गर्म चमकती सतह पर पानी की छीटें मारते ही पानी फौरन भाप बनकर उड़ जाता। उनके हाथों की मोटी-मोटी कलाइयाँ थकने का नाम ही नहीं लेती थी। दिनभर अपने धड़े पर खड़े-खड़े कोयले की प्रेस को वो कपड़ों के ऊपर फिराते रहते। एक आदमी और क्या चाहाता है। हर कामयाबी उसके कदम चूमे। इसी हसरत को वो दिल में पाले रहते थे।

आँखों में वो एक हरकत लिये जब शाम को अपनी घरवाली से पूरे दिन की थकावट को लेकर सुस्ताते हुए कहते,

"अरी बुढिया सुनती है का मेरा पव्वा ला के दे।"

वाकई ये उनकी एक दरख्वास्त होती थी अपनी जान से प्यारी अर्धागनी के रू-ब-रू। बहुत मुमकिन से सवाल के जवाब में वो कहती, "बूढापे में ज़ॉयादा मुँह से लगाओगे तो खा जायेगी ये शराब निगोड़ी।"

उनकी बात पूरी नहीं होती की राम जी जोर से हंस पड़ते उन कर मुँह के सारे दाँत उखड़ चुके थे पर मन में उठी हलचल को किसी तरह व्यक़्त तो करना होता था सो वे गले से तेज़ आवाज़ निकाल के हँसने का मज़ा ले लेते।
"तेरा एहसान होगा मुझ पर जा ला कर दे दें। मेरी टाँगों से अब चला नहीं जाता।"

कितना भी इनके भले का सोचो पर ये है की हर बार जोखिम उठाते हैं। डॉक्टर ने शराब पीने को मना किया है। पर इन की जिद्द के आगे मेरी कब चली है जो आज चलेगी। अम्मा सारी बातों को अपनी आँखों में आंसू लिये बता रही थी। उनकी आँखे पत्थरा गई थी। तख्त के उपर ठन्डी लोहे की प्रेस खुली पड़ी थी। मोटी चादर के नीचे दबा काला कम्बल जिसका कोना निकला पड़ा था तख्त को अम्मा ने ग्राहको के कपडे प्रेस करने का धड़ा बना रखा था पर रात मे वो इस धडे पर सोया करती थी। पानदानी मे पान की छाली कथ्था तम्बाकू की पुड़िया छाली काटने का कटर रखा था।

उनका पान खाने का कोई इरादा नहीं था। नहीं चेहरे पर नींद झलक रही थी। वो एक ऐसे एहसास मे डूबी थी जिस को अपने करीब पाने से ही उन की रूह को जैसे किसी का शरीर मिल गया हो। अम्मा जो राम जी की बीवी है वो राम जी अब इस दुनिया मे नहीं रहे पर अम्मा उन के बनाये प्रेस के धडे को अब तक चला रही है।

अपने कपड़ों पर प्रेस कराने वाले सब लोग राम जी की बीवी को अम्मा कह कर पूकारते है। उनका असली नाम कोई नही जानता पर नाम भी छुपने वाली चीज नहीं एक दिन तो बाहर आना था।

"सीता सुन तो सही।" इस नाम से बाबा राम अम्मा को बुलाते थे। उन्होनें जब खाली पड़े पव्वो की तरफ देखा तो नज़र चन्द लम्हो के लिये वहीं रूक सी गई। मैनें पूछने की बहुत कोशिश की सवाल किये पर अम्मा नहीं बोली मानो जैसे किसी खामोशी ने उनके होठों को सिल दिया हो।

बात कुछ देर के थी रूक गई। कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका जवाब नहीं दिया जाता बस, उन्हे अपने में गड़ लिया जाता है जब तक की हम अपने को न भुला दे। याद रहे तो ये की किस के लिये खुद को भुलाया।

चूंहो के मोटे-मोटे बिल अम्मा के छप्पर तले चारों ओर जमीन मे खुदे पड़े थे। मैने दोबारा कोशिश की, "क्या बात है?"

उनका अब उत्तर मिला, "क्या बात हो सकती है जो हुआ सो हुआ। तेरे बाबा की याद आ रही है।"

जब मैनें उनकी सारी बातें सुनी तो मेरे मन मे कई विचार कोधने लगे। बाबा जाग रहे हैं और अम्मा सुबह मन्दिर जाने के लिये पुजा की थाली सजा रही है। जब देखो बीडियाँ। बीडियाँ कोने-कोने मे अध्जली बीड़ियो का ढेर लगा रखा है आखिर काम करने वाली है ना। मर गई तो मुझे भी इन बीड़ियों की तरह फूँक देना। वो मुस्करा कर कहत, "तुझसे पहले मैं मरूगाँ।"

दो बच्चो को लेकर राजस्थान से ये दोनो मियाँ-बीवी आये थे। बच्चे बड़े हो गये। शादी के बाद दोनों ने अलग रहने का फैसला ले लिया। राम जी और अम्मा दोनों अकेले आकर पार्क के कोने से सटाकर एक ठिया बनाने लगे। अम्मा और बाबा के प्रेम से बोलने और इज्जत पाने से गली के सारे लोग उन्हे राम-राम करते निकल जाया करते थे। बातचीत में समझ आ रहा था की राम जी और सीता जी की बकायदा सब से अच्छी बोलचाल थी। दोनों तो नहीं पर उनमे से एक जरूर है जो अब तक उस जगह को महीने हफ़्तों में आकर देख जाया करता है।

राकेश

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