Monday, May 18, 2009

बारातघर से गुज़रता रास्ता...

बारातघर के सामने से जगमगाते बिजली के झूमर और बैंड-बाजे के साथ नाचते-गाते लोगों का रोमांचकारी माहौल गुज़र रहा था। रात के अंधेरे को मात देती ये अलौकिक बारात की टुकड़ियाँ सड़क के रास्ते से अक्सर निकला करती है।

एक गली के कोने पर बना ये सफ़ेद गुम्मट का मन्दिर जो काफी अरसे पुराना है। सब कुछ बदल गया पर ये मन्दिर की दरों-दिवार और यहाँ पर बहुत पहले से ही बैठने वाला एक शख़्स नहीं बदला। हम बदलाब को एक नई भूमिका में देखगें। जो की सब कुछ बदल रहा है पर शरीर जो तस का मस अपने आधार पर कायम है। जो वक़्त के आगे अपना असाधारण पात्र बनके अपने को हालात के किसी भी प्रहार से टूटने से बचाएँ रखता है। जीवन में अपने को इस असाधारण वेशभूषा में लाकर रखने वाले जो मन्दिर की देवी की सेवा करते ही रहते हैं। एक पेहरेदार की तरह वो मन्दिर के ठीक दरवाज़े के पास बैठ जाते है। जिन्हे यहाँ के लोग केशरी लाल के नाम से जानते है और एक बुर्ज़ुग शख़्स के नाते सब उनका बड़ा ही सम्मान करते है।


बदलाव पर ये अन्गिनत कथाएँ सुनाते रहते हैं और गली के सारे लोग इनकी बातों का विश्वास करते हैं। एक अनुभवी व्यक़्ति होने के साथ उनकी दिलचश्पी मन्दिर के साथ वक़्त गुज़ारने में ज़्यादा रहती है। वो अभी रिटायर हो चुके हैं। केशरी लाल की आँखों से देखे तो आज की तस्वीर के अन्दर ही बदलाव से पहले की वो धरातल दिखाई देगी। जहाँ कभी जमाने भर के हर ख़्याल और अफ़सानों को सुनाने वालों का गुट हुआ करता था। दिवारों की खुर्दरी सतहों पर हरी-सफेद फफूंदी हुआ करती थी। जब यहाँ एक बड़ा सा शौचालय हुआ करता था। लेटरिंग के दरवाज़ों के बाहर खड़े शख़्स तैमद, निक्कर और गम्छा डालकर बीढ़ियों के धूएँ में अपने को व्यस्त रखा करते थे। दिवारों के मुंडेरियों पर बोतलों और पुराने डिब्बो की लाईन लगी रहती थी। हर कोई यहाँ अपने को हल्का करने आता था। करीब सुबह के तीन-चार बजे से ही आसपास के ब्लॉको से लोगबाग यहाँ आ कर फ्री हुआ करते।

ये शौचालय पीली कोठी के नाम से दक्षिणपुरी मे प्रसिद्द था क्योंकि शौचालय की बाहर की दिवारों पर पीले रंग की सफेदी कर रखी थी। सड़क के ठीक साथ में ही ये शौचालय बना था जे ब्लॉक और अठ्ठारह ब्लॉक के बीच में बनी पीली कोठी नामक शौचालय अब पहले वाली पहचान खो बैठा है।

बारातघर जो इस की जगह में खड़ा है। जो पहले था वो अब नहीं बस, कल और आज के बीच लटकी चन्द तस्वीरें हैं जो कहीं गुमनामी के अन्धेरों में किसी के साये में बैठी है। आँख जब सब कुछ साफ़-साफ़ देखना चाहती है तब ये वक़्त की आँधी ऐसी चलती है मानों कुछ देखता ही मुश्किल हो जाता है फिर एक ही रास्ता बचता है की जो ज़्यादा नज़दिक है उसी छोर को पकड़ लिया जाये। वक़्त की इस बेडोल आंधी में सब पानी की रह बह जाता है। बस, रह जाता है तो ज़मीन पर घाँस तिनको और रह गए अवशेष जो मिट्टी की दलदल में धसें और ऊपर आये तत्व। आदमी तत्व का रूप है या तत्व आदमी के रूप बना खड़ा होता है।

केशरी लाल जब वे भी अपनी स्वीकृति को लिए सब की दावतों में जुड़े रहते थे। सड़क से गुज़रते लोग उन्हे हाथ उठाकर दूआँ-सलाम करते थे। कोई ऐसा नहीं था जिसकी नज़र इनके ऊपर न पड़ती हो। सड़क सामने पहले भी बारातों का सिल-सिला जारी रहता था लोग तब भी इसी तरह दुल्हे के घोड़ी चढ़ने का जश्न मनाया करते थे। वो भी एक वक़्त था ये भी एक वक़्त है। कही इसी के बीच में विशेष रूप से फँसे ये भी अपने को सम्पन्न देखते हैं पर ये सम्पन्न होना कुछ अलग है। जिसमें सत्तर वर्षीये केशरी लाल जी अपने को किसी मजबूत शिला से कम नहीं समझते। पूरे दिन सड़क के पास में पीपल के पेड़ की छाँव में आराम से मन्दिर की निघरानी करते हैं। जो कोई भी सड़क से होकर गुज़रता है उसे बड़ी बारीकी से जाँचते हैं। ये उनकी आदन बन गई है। उम्र के साथ शरीर कि अन्दर की ताकत कम हो गई है जिससे शरीर प्रभावित है। उनके कान में एक सुनने की मशीन लगी रहती है जो पहले से तेज़ और साफ सुनने में उन की मदत करती है।

वैसे भी उनको देखकर ऐसा लगता है की वो बिना मशीन के भी सुन सकते है। क्योंकि उन देखकर लगता है की उनकी आँखें वक़्त के किसी सुक्ष्मदर्शी फ्रेम से झाँक रही है। वो बैठे रहते हैं कुछ सोचने और हक़िकत से कल्पना कि बुनाई करने में। उनका चेहरा समान्य रूप से खिला रहता है पर वो उस के पीछे प्रचंड समाधी लिए होते हैं।

राकेश

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