Friday, October 8, 2010

अनगिनत परछाइयों की छाया



हर कोई अपने अंदर कई ऐसी परछाइयाँ लिये चलता है जिसे वे किसी छाया के रूप के बनाने की कोशिश में है। वे परछाइयाँ जो उसकी हैं, उसपर जिसकी पड़ी हैं उसकी हैं, उसकी हैं जो उसे छोड़कर चला गया है और उसकी जो उसके लिये आया है। एक अकेली परछाई हकीकत में कई छुअनों का अहसास देती है और एक छाया कई परछा‌इयों के मिलन से बनती है।

वो मिलन जो किसी के छूने से बना है, किसी के इशारे से पनपा है, किसी के अक्श से बना है। इसमें उस गुंजाइश का कल्पना होती है जो कई और जगहें और ठिकाने बनायेगा। वे ठिकाने जो किसी एक के लिये नहीं होगें।

लख्मी

1 comment:

seema gupta said...

परछा‌इयों को पकड़ना भी तो आसान नहीं....

regards